गुनाहों का देवता – एक आत्मा को झकझोर देने वाला प्रेम-प्रसंग (धर्मवीर भारती जी के कालजयी उपन्यास की समीक्षा)

पिछले कुछ दिनों से जब भी समय मिला, मैं धर्मवीर भारती जी का बहुचर्चित उपन्यास "गुनाहों का देवता" पढ़ता रहा। हर पंक्ति, हर दृश्य ऐसा जैसे शब्द नहीं, अनुभव बोल रहे हों। यह मात्र एक प्रेम कथा नहीं, यह आत्मा को छूने वाला, भीतर तक उतार देने वाला जीवन-रस है और अब जब यह यात्रा पूरी कर चुका हूँ, तो मन में यही ख्याल आता है "इतने सालों तक मैं इससे अंजान क्यों रहा?"


उपन्यास की पूरी बुनियाद प्रेम पर टिकी है, पर यह कोई साधारण प्रेम नहीं। चन्दर और सुधा का प्रेम, किसी देह की चाह या सामाजिक बंधनों में जकड़ा रिश्ता नहीं है, बल्कि यह एक आत्मिक बंधन है, पवित्र, निष्कलंक और अनकहा। इनका प्रेम जितना निर्मल है, उतना ही पीड़ादायक भी, क्योंकि इसमें बहुत कुछ है जो कहा नहीं जाता, बस जिया जाता है।

धर्मवीर भारती जी ने पात्रों को जिस सूक्ष्मता और संवेदना से गढ़ा है, वह अद्भुत है। ऐसा लगता है जैसे चन्दर, सुधा, पम्मी, बिनती या डॉक्टर शुक्ला हमारे आसपास ही कहीं हैं, हम उन्हें जानते हैं, महसूस करते हैं, और उनके दर्द में भीगते हैं।

इस उपन्यास की सबसे बड़ी खूबी यही है कि यह सिर्फ प्रेम की बात नहीं करता, बल्कि यह प्रेम के भीतर छिपे संघर्ष, समाज की विडंबनाओं, मानसिक द्वंद्व और आत्मा की टूटन को सामने लाता है। इसमें निश्छल प्रेम है, तो कहीं वासना की कशमकश भी। इसमें त्याग है, मगर साथ ही वह पीड़ा भी, जो किसी को अंदर तक तोड़ देती है।

सबसे मार्मिक दृश्य है जब वह क्षण आता हैजब चन्दर, सुधा को थप्पड़ मार बैठता है तब सुधा का जवाब, "कहीं तुम्हारे हाथ में चोट तो नहीं लगी चन्दर?" यह पंक्ति जैसे सीधे हृदय को चीर देती है। यही उस प्रेम की पराकाष्ठा है, जो आत्मा से उपजता है, स्वार्थ से नहीं।

"गुनाहों का देवता" सिर्फ पढ़ा नहीं जाता, इसे जिया जाता है।

अगर अब तक नहीं पढ़ा है, तो यकीन मानिए, आपने प्रेम का सबसे सुंदर रूप अब तक नहीं देखा।


आशीष वर्मा

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