"आषाढ़ का एक दिन" – मोहन राकेश जी द्वारा लिखा एक नाटक

        

            मोहन राकेश का नाटक "आषाढ़ का एक दिन" आधुनिक हिंदी रंगमंच का महत्वपूर्ण कार्य है, लेकिन साफ कहूँ तो यह हर किसी को पसंद आए, ऐसा नहीं है। अगर आप कालिदास के दीवाने हैं या थिएटर के शांत, भावनात्मक, लंबे संवादों वाले नाटक पसंद करते हैं, तो यह आपको छू जाएगा। वरना बीच-बीच में आपको लगेगा कि कहानी बहुत धीरे चल रही है।

        यह नाटक कवि कालिदास और गाँव की लड़की मल्लिका के रिश्ते की परतें खोलता है। मल्लिका का प्यार किसी मांग का नाम नहीं है, यह इंतज़ार और त्याग का दूसरा नाम है। वह जानती है कि कालिदास का मन गाँव की सीमाओं में नहीं रुक सकता, फिर भी उसके लौटने की आशा में अपना जीवन थामे रहती है। कालिदास भी मल्लिका को चाहता है, पर उसकी चाहत में स्थायित्व नहीं है वह कविता में जितना सच्चा है, रिश्तों में उतना ही उलझा हुआ। 

        उनके बीच हर मुलाक़ात में एक अनकही दूरी रहती है, जैसे दोनों जानते हैं कि उनका साथ लंबा नहीं चलेगा, लेकिन फिर भी उसके अंत का सामना करने से डरते हैं। मल्लिका की चुप्पी नाटक का सबसे गहरा संवाद है; वह शब्दों से कम, अपने मौन से अधिक कहती है। यह मौन, कालिदास की सबसे बड़ी हार भी है और सबसे बड़ा प्रेरणा स्रोत भी।
        भाषा और संवाद बहुत साहित्यिक हैं, जो मंचन के लिए उपयुक्त हैं, लेकिन साधारण पाठकों को कभी-कभी भारी लग सकते हैं। फिर भी, जो पाठक कालिदास की काव्यात्मा से जुड़ाव रखते हैं या रंगमंच की गहराई को आत्मसात करना जानते हैं, उनके लिए यह नाटक भावनाओं और आत्ममंथन का अनूठा अनुभव है।

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