आज मेरे हाथों एक पुरानी-सी किताब लगी "कबीरा खड़ा बाजार में", लेखक: भीष्म साहनी।
यह किताब मेरे स्वर्गीय पिताजी के पुस्तकीय संकलन से मिली, और उसके पहले
पन्ने पर लिखा नाम मुझे ठहरकर सोचने पर विवश कर गया "राकेश पाटीदार", पिताजी के
पुराने मित्र। यह पुस्तक सन् 1985 में खरीदी गयी थी जिसपर मूल्य ६ रूपये लिखा है,
उस समय की जब किताबें धरोहर होती थीं और लेखन आत्मा से संवाद करता था।
आज उसी किताब की एक आत्मीय समीक्षा साझा कर रहा हूँ। एक पाठक के रूप में और एक खोजी दृष्टि
से जो कबीर को केवल संत नहीं, एक जीवंत, लड़ाकू, और सहज मानव के रूप में देखना
चाहता है।
“चलती चाकी देख के, दिया कबीरा रोय।
दो पाटन के बीच में, साबुत बचा न कोय।”
भीष्म साहनी जी द्वारा रचित नाटक "कबीरा खड़ा बाज़ार में" केवल संत कबीर के जीवन पर आधारित एक जीवनीात्मक नाट्य नहीं है, बल्कि यह सामाजिक विडंबनाओं, धार्मिक पाखंड, और मानवीय विवेक के बीच एक क्रांतिकारी आवाज़ भी है।
हममें से अधिकांश जब 'कबीर' का नाम सुनते हैं, तो हमारे मन में एक वृद्ध साधु जैसे व्यक्ति की छवि उभरती है, एक जुलाहा जो झोपड़ी में बैठकर ताने-बाने के साथ जीवन का सत्य बुनता है। लेकिन इस नाटक को पढ़ते हुए पाठक पहली बार कबीर के लड़कपन, युवावस्था, विद्रोह, प्रेम और संघर्ष से भी रूबरू होता है।
नाटक की एक खूबी यह है कि यह कबीर को एक जीवंत, सांस लेता हुआ, गलियों में दौड़ता हुआ, सवाल करता हुआ, और जरूरत पड़ने पर विद्रोह करता हुआ युवक दिखाता है। यह कबीर किसी संत के आसन पर नहीं बैठा, बल्कि "बाज़ार में खड़ा" है, लोगों के बीच, जीवन के बीच, सत्ता और धर्म के बीच, जो प्रश्न करता है:
"बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय।
जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।"
यह दोहा नाटक में एक ऐसा मोड़ लाता है जहाँ कबीर का आत्मचिंतन और समाज पर टिप्पणी दोनों एक साथ प्रकट होते हैं।
भीष्म साहनी का लेखन गहन अध्ययन और मानवीय संवेदना से परिपूर्ण है। उन्होंने कबीर को न केवल संत या विचारक के रूप में प्रस्तुत किया, बल्कि एक मानव के रूप में दिखाया है, जो गलतियाँ करता है, जो प्रेम करता है, जो तड़पता है और फिर भी सत्य के लिए अडिग खड़ा रहता है।
नाटक की सबसे बड़ी ताकत इसका धार्मिक कट्टरता और सामाजिक असमानता पर प्रहार है। चाहे वह हिंदू हो या मुस्लिम, कबीर दोनों की रूढ़ियों को तोड़ते हैं और पूछते हैं:
"क्या मंदिर में है राम? क्या मस्जिद में है खुदा?
या वो इस बाज़ार में भी मिल सकता है?"
यह प्रश्न दर्शकों को झकझोरता है। क्योंकि कबीर की आवाज़ किसी धर्म का प्रचार नहीं, बल्कि इंसानियत का उद्घोष करती है।
"कबीरा खड़ा बाज़ार में" एक ऐसा नाटक है जो कबीर को फिर से खोजता है न केवल इतिहास में, बल्कि हमारे भीतर। यह हमें यह समझने का अवसर देता है कि कबीर कोई बूढ़े फकीर मात्र नहीं थे, बल्कि एक युवा विद्रोही भी थे जो बाजार में खड़े होकर जमाने से कहता है कि "मैं तुम्हारे बने बनाए ढाँचों को नहीं मानता।"
इस नाटक को पढ़ना, मानो आत्मा के आईने में झाँकना है। मेरे हिसाब से इसे हर व्यक्ति को एक बार ज़रूर पढ़ना चाहिए था।

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