"गबन" — मुंशी प्रेमचंद का आज भी प्रासंगिक उपन्यास


            मुंशी प्रेमचंद का गबन 1931 में लिखा गया, लेकिन यह आश्चर्यजनक है कि लगभग एक सदी बाद भी इसकी प्रासंगिकता ज़रा भी कम नहीं हुई। यह उपन्यास स्वतंत्रता-पूर्व भारत की पृष्ठभूमि में रचा गया, पर इसका मूल संदेश समय की सीमाओं को लांघकर आज तक प्रासंगिक बना हुआ है दिखावे की प्रवृत्ति और अंधी इच्छाएँ मनुष्य को नैतिक और आर्थिक पतन की ओर ले जाती हैं।
               कहानी का केंद्र है रमानाथ, एक मध्यमवर्गीय युवक, और उसकी पत्नी जालपा। जालपा को गहनों का मोह है, और रमानाथ अपनी सीमित आय में भी उसकी इच्छाएँ पूरी करने की कोशिश करता है। समाज में ‘उँचा’ दिखने और पत्नी को खुश करने की चाह में वह धीरे-धीरे आर्थिक विवशताओं से जूझने लगता है। जब आय से अधिक खर्च की आदत चरम पर पहुँचती है, तो रमानाथ गलत रास्तों पर जाने को मजबूर हो जाता है यही है उपन्यास का ‘गबन’।
             जालपा, जो शुरू में भौतिक इच्छाओं की प्रतीक है, अंततः परिस्थितियों और अनुभवों से बदलती है। कहानी के अंत में प्रेमचंद यह स्पष्ट करते हैं कि सच्ची सम्पन्नता गहनों या पैसे में नहीं, बल्कि नैतिकता, रिश्तों और मानसिक शांति में है। 

पात्रों के बारे में 

रमानाथ – महत्वाकांक्षी, लेकिन चरित्र की दृढ़ता में कमजोर; वह मध्यमवर्ग के उस युवक का प्रतीक है जो समाजिक दबाव और दिखावे में फंसकर जीवन की दिशा खो देता है।

जालपा – प्रारंभ में मोह और अहंकार से भरी, पर अंततः आत्मबोध से युक्त; वह बदलाव और आत्मचेतना की संभावना को दर्शाती है।

रतन और अन्य पात्र – प्रेमचंद के लेखन की खासियत है कि सहायक पात्र भी कहानी में जीवंतता और यथार्थ लाते हैं।

            आज की पीढ़ी में भी रमानाथ और जालपा जैसे असंख्य चेहरे मिलते हैं, जो कर्ज़, क्रेडिट कार्ड और ईएमआई में डूबकर महंगे शौक और सोशल मीडिया के दिखावे को पूरा करने में लगे हैं। अंतर केवल इतना है कि उस समय के गहने और शान-शौकत की जगह अब ब्रांडेड कपड़े, स्मार्टफोन और लक्ज़री टूर ने ले ली है।

               रमानाथ का यह भाव आज भी सटीक बैठता है  "इच्छाओं का कोई अंत नहीं, और जब तक वे हमें चलाती रहेंगी, हम चैन से नहीं जी पाएँगे।"

               गबन केवल एक पारिवारिक या प्रेम-कथा नहीं, बल्कि मध्यमवर्गीय मानसिकता का गहरा अध्ययन है। यह उपन्यास हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हम भी अपने जीवन में किसी "गबन" के रास्ते पर तो नहीं हैं चाहे वह धन का हो, आत्मसम्मान का या रिश्तों का। लगभग सौ साल पुरानी यह कृति यह सिद्ध करती है कि महान साहित्य समय से परे होता है, वह हर पीढ़ी को अपना आईना दिखाता है।

               साहित्य की नजर से देखें तो गबन प्रेमचंद की कहानी लिखने की कला का बेहतरीन उदाहरण है। इसमें उस समय के समाज और लोगों की ज़िंदगी का बिल्कुल सच्चा चित्र मिलता है। पात्र, बातें और घटनाएँ इतनी असली लगती हैं कि जैसे सब हमारी आंखों के सामने हो रहा हो। इसकी भाषा बिल्कुल साफ, सहज और भावनाओं से भरी है, जिसमें कभी हल्का-सा मज़ाक तो कभी गहरी संवेदना मिलती है। कहानी हमें एक जरूरी सीख भी देती है, लेकिन यह सीख बोझिल या उपदेश जैसी नहीं लगती, बल्कि ज़िंदगी से खुद-ब-खुद निकल कर सामने आती है और पढ़ने वाले के मन में उतर जाती है।

अगर आप पढ़ने के शौक़ीन हैं तो इस उपन्यास को ज़रूर पढ़ना चाहिए। 

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