सूरज का सातवां घोड़ा - धर्मवीर भारती जी के उपन्यास की समीक्षा

मैंने आज भारती जी का "सूरज का सातवां घोडा" उपन्यास पढ़कर खत्म किया, शुरू की दो कहानियों तक तो लगा कि ऐसी तो कोईं भी लिख सकता है, लेकिन जैसे-जैसे आगे बढ़ा, मन ऐसा हुआ कि एक ही दिन में पूरा उपन्यास ख़त्म करना पड़ा।"

   

धर्मवीर भारती जी का यह उपन्यास धीरे-धीरे आपके भीतर उतरता है, फिर भीतर ही कहीं कुछ उलझाता है और अंत तक एक स्थायी छाप छोड़ जाता है।

इस उपन्यास को ‘लघु उपन्यास’ कहा गया है, लेकिन इसकी गहराई किसी भी बड़े उपन्यास से कम नहीं। यह उपन्यास सिर्फ प्रेम कहानियों का संग्रह नहीं है, बल्कि यह उन कहानियों के पीछे छिपे समाज, समय, और मानवीय विवशताओं की भी पड़ताल करता है। प्रेम को एक अलग तरह से समझाया है जिसमे सामाजिक और आर्थिक दोनों पहलु निहित है। 

शुरुआत में जब माणिक मुल्ला की दो कहानियाँ पढ़ते हैं, तो सच में लगता है कि यह तो सामान्य-सी प्रेम कथाएँ हैं। लेकिन फिर जैसे-जैसे ये कहानियाँ खुलती हैं, उनमें छिपा मानवीय द्वंद्व, नैतिकता और विवशता की परतें सामने आने लगती हैं।

माणिक मुल्ला इस उपन्यास का केंद्रीय पात्र है। एक ऐसा व्यक्ति जो अपने मित्रों को अपने घर बैठकर कहानियाँ सुनाता है। लेकिन माणिक सिर्फ एक कहानीकार नहीं है, वह एक दार्शनिक, एक दृष्टा और कभी-कभी खुद भी इन कहानियों का हिस्सा है।

उसके लिए प्रेम कोई आदर्शिक चीज़ नहीं, बल्कि वह इसे आम ज़िंदगी की तरह देखता है, जहाँ समझौते हैं, उम्मीदें हैं, असफलताएँ हैं, और कभी-कभी ठोकर भी।

माणिक मुल्ला कहानियाँ सुनाता है, लेकिन सुनाते-सुनाते कहीं न कहीं पाठक के मन में अपने ही प्रश्न छोड़ जाता है।

धर्मवीर भारती की यह अनूठी शैली है, ऐसा लगता है जैसे कोई पुराना मित्र आपकी बगल में बैठा कह रहा हो "अरे सुनो, एक बार की बात है..."। और आप बस सुनते चले जाते हैं।

उनकी भाषा सहज है, व्यंग्यपूर्ण है, लेकिन कभी भी हल्की नहीं लगती। उपन्यास में माणिक मुल्ला की कहानियाँ, उनके पात्र, और उनके संवाद सभी मिलकर एक ऐसा चित्र रचते हैं जो भारतीय समाज के मध्यम वर्गीय मानसिकता, प्रेम की विफलताएँ, और जीवन की कड़वाहट को बहुत ही सादगी से उकेरते हैं।

अगर आपने यह उपन्यास नहीं पढ़ा है, तो ज़रूर पढ़िए। और अगर पढ़ा है, तो शायद दोबारा पढ़ने से नए अर्थ खुलें, क्योंकि माणिक मुल्ला की कहानियाँ समय के साथ और भी स्पष्ट होती जाती हैं।

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